छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में स्थित मां बमलेश्वरी धाम प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। पहाड़ी की चोटी पर बड़ी मां बमलेश्वरी और नीचे छोटी मां का मंदिर है। नवरात्र के दौरान यहां देशभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
1100 सीढ़ियां और रोपवे से दर्शन
पहाड़ी पर स्थित बड़ी मां के मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को लगभग 1100 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। बुजुर्गों और सीढ़ियां चढ़ने में असमर्थ लोगों के लिए रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है। मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष मनोज अग्रवाल के अनुसार, रोपवे की तकनीकी व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए बीते छह महीनों में करीब सवा करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
901 मनोकामना ज्योतों की परंपरा
चैत्र और क्वार नवरात्र में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं के लिए ज्योत प्रज्वलित करवाते हैं। नवमी पर ज्योत कलशों के विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है। मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष के मुताबिक, इस दौरान 901 ज्योति कलशों का विसर्जन आयोजन का प्रमुख आकर्षण है। इस आयोजन को लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिलने का भी उल्लेख किया जाता है।
पंचमी भेंट में दिखता है सांस्कृतिक संगम
मां बमलेश्वरी धाम की एक खास परंपरा पंचमी भेंट है। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों से आदिवासी समाज के बैगा पारंपरिक पूजा-पद्धति के साथ माता के दरबार पहुंचते हैं। आंगा देव और मां बमलेश्वरी के मिलन से जुड़ा यह आयोजन छत्तीसगढ़ की लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
इतिहास और लोकमान्यताओं से जुड़ा धाम
स्थानीय जनश्रुतियों में मां बमलेश्वरी धाम का संबंध राजा विक्रमादित्य से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर माता ने दर्शन दिए थे। हालांकि, इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि के लिए प्रमाणित स्रोत आवश्यक हैं।
मंदिर में हाल ही में एक भक्त ने पीतल से निर्मित बब्बर शेर की प्रतिमा भेंट की है, जिसे मंदिर परिसर में स्थापित किया जाना है। मां दुर्गा के वाहन के रूप में शेर शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है।