हिंदी के विकास के साथ क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण भी जरूरी: बलौदाबाजार में राष्ट्रीय संगोष्ठी

बलौदाबाजार। हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में मजबूत बनाने के साथ देश की भाषाई विविधता का संरक्षण भी जरूरी है। इसी मुद्दे पर शासकीय दाऊ कल्याण कला एवं वाणिज्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बलौदाबाजार में 16 अक्टूबर को राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। ‘संपर्क भाषा हिंदी : चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ’ विषय पर हुई चर्चा में विद्वानों ने हिंदी की प्रासंगिकता, भारतीय भाषाओं के संरक्षण और साहित्य में शोध की संभावनाओं पर विचार रखे।

विशिष्ट अतिथि प्रो. डॉ. जी. ए. घनश्याम ने कहा कि भारत की सांस्कृतिक समृद्धि उसकी भाषाई विविधता में है। हिंदी के विकास के साथ दूसरी भारतीय भाषाओं का सम्मान और संरक्षण भी जरूरी है। उन्होंने भाषाओं के बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय संवाद और सहयोग को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

प्रो. डॉ. अनुसुइया अग्रवाल ने कविता और साहित्य को सामाजिक चेतना तथा बदलाव का माध्यम बताया। उन्होंने विद्यार्थियों और शोधार्थियों को हिंदी भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में गंभीर अध्ययन और अनुसंधान के लिए प्रेरित किया।

महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. धनंजय मिश्रा ने संगोष्ठी को अकादमिक गतिविधियों और शोध को प्रोत्साहित करने वाला प्रयास बताया। हिंदी विभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी संयोजक प्रो. डॉ. हीरालाल शर्मा ने विषय की वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। डॉ. रीता यादव ने विभागीय प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम के दौरान महाविद्यालय की पत्रिका ‘वसुंधरा’ और डॉ. हीरालाल शर्मा की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ : परंपरा, प्रयोग’ का विमोचन भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन शोध छात्र दीपक कुमार तिवारी ने किया, जबकि डॉ. राजेंद्र वर्मा ने आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में महाविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।