हाई कोर्ट का बड़ा आदेश, बिना अधिग्रहण हाईवे निर्माण के आरोपों पर 30 दिन में होगा जमीन का सीमांकन

 बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के लिए बिना भूमि अधिग्रहण और मुआवजा दिए किसान की जमीन उपयोग किए जाने के आरोपों पर महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। जस्टिस एके प्रसाद की एकलपीठ ने बिलासपुर कलेक्टर को निर्देश दिया है कि राजस्व अधिकारियों की विशेष टीम गठित कर 30 दिनों के भीतर विवादित भूमि का दोबारा सीमांकन कराया जाए।

किसान ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती

याचिकाकर्ता सीमा शर्मा ने हाई कोर्ट में दायर याचिका में बताया कि वह बिलासपुर जिले की बोदरी तहसील के ग्राम मुढ़ीपार स्थित खसरा नंबर 352/5 की 0.25 एकड़ कृषि भूमि की मालिक हैं। उनका आरोप है कि राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण के दौरान उनकी जमीन का उपयोग किया गया, लेकिन इसके लिए न तो भूमि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई और न ही कोई मुआवजा दिया गया।

याचिका में बाजार मूल्य के आधार पर 18 प्रतिशत ब्याज सहित मुआवजा और पुनर्वास का लाभ देने की मांग की गई थी।

जमीन की पहचान को लेकर था विवाद

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण और याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि पूरे मामले का मुख्य विवाद जमीन की वास्तविक स्थिति और सीमांकन को लेकर है। सभी पक्षों ने सहमति जताई कि निष्पक्ष सीमांकन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि संबंधित भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण में शामिल हुई है या नहीं।

कलेक्टर को विशेष टीम बनाने का निर्देश

हाई कोर्ट ने बिलासपुर कलेक्टर को तहसीलदार, राजस्व निरीक्षक और संबंधित पटवारी की संयुक्त टीम गठित करने के निर्देश दिए हैं। यह टीम आदेश प्राप्त होने के 30 दिनों के भीतर विवादित भूमि का सीमांकन करेगी। अदालत ने यह भी कहा कि सीमांकन के दौरान दोनों पक्षों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए।

जमीन उपयोग साबित होने पर मिलेगी पूरी कानूनी राहत

अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि सीमांकन में यह साबित होता है कि याचिकाकर्ता की भूमि का उपयोग बिलासपुर-रायपुर राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण में किया गया है, तो संबंधित प्राधिकरण को वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा, पुनर्वास और पुनर्व्यवस्थापन की प्रक्रिया तत्काल शुरू करनी होगी।

चार महीने में पूरी होगी आगे की प्रक्रिया

हाई कोर्ट ने सीमांकन पूरा होने के बाद पूरे विवाद का निपटारा कर अंतिम आदेश पारित करने के लिए संबंधित अधिकारियों को चार महीने का अतिरिक्त समय भी दिया है। इससे मामले का कानूनी समाधान तय समयसीमा के भीतर होने का रास्ता साफ हो गया है।